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इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) की जानकारी | What is Electronic Voting Machines (EVM) in Hindi


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भारत में प्रत्येक लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव में मतदान की प्रक्रिया पूरी तरह से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन द्वारा ही संपन्न होती है| पुराने कागजी मतपत्र प्रणाली की तुलना में ईवीएम के द्वारा वोट डालने और परिणामों की घोषणा करने में कम समय लगता है। इस लेख में हम इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इतिहास और उसकी कार्यप्रणाली का विवरण दे रहे हैं जिससे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के बारे में आपकी समझ विकसित होगी। …

Interesting things about Electronic Voting Machines

Electronic Voting Machine (EVM) information in hindi भारत एक लोकतान्त्रिक देश है. यहाँ की सरकार यहाँ की जनता द्वारा चुनी जाती है. जिस पद्धति द्वारा सरकार गठन के लिए लोग अपने अपने क्षेत्र से लोकसभा या विधानसभा के लिए अपना प्रतिनिधि चुनते हैं, उसे चुनाव कहा जाता है. चुनाव भारत के ‘चुनाव आयोग’ की देख –रेख में होता है. स्वतंत्रता के बाद भारत का पहला चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 27 मार्च 1952 के बीच हुआ. इस दौरान चुनाव के समय वोट बैलेट बॉक्स के इस्तेमाल से होता था, जिसमे एक विशेष काग़ज़ पर अपने भरोसेमंद उमीदवार के चुनाव चिन्ह पर निशान लगाकर डालना होता था. धीरे -धीरे इस तरीक़े में बहुत सी खामियां और भ्रष्ट्राचार आते गये. कहीं -कहीं बूथ लूटने जैसी घटनाओं को देखा गया. इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए भारत के चुनाव आयोग ने एक ऐसे सिस्टम की कल्पना की, जिसमे भ्रष्टाचार कम से कम हो और लोकतंत्र पर कोई खतरा न आने पाए. इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन जिसे संक्षिप्त में ईवीएम भी कहा जाता है, इसी कल्पना की देन है.

ईवीएम के इतिहास पर एक नज़र (Electronic Voting Machine history)

सन 1980 में एम.बी. हनीफा ने पहली बार भारत के चुनाव के लिए वोटिंग मशीन का आविष्कार किया. ये दरअसल ‘इलेक्ट्रानिक रूप से संचलित वोटों की गिनती करने की मशीन’ थी. पहली बार इसे तमिलनाडू के छः शहरों में इसके मूल रूप के साथ लाया गया. सन 1989 में भारतीय चुनाव आयोग ने इसे ‘इलेक्ट्रॉनिक को- ऑपरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड’ के साथ मिलकर इसे साधिकार किया. ईवीएम के इंडस्ट्रियल डिज़ाइनर आइआइटी बॉम्बे के फैकल्टी सदस्य थे.

ईवीएम के विनिर्माता (Electronic Voting Machine manufacturers)

ईवीएम को सर्वप्रथम ‘इलेक्ट्रॉनिक को- ऑपरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड’ ने बनाया. उसके बाद चुनाव आयोग ने अपनी देख- रेख में दो बड़ी इलेक्ट्रॉनिक कंपनियों को इस काम के लिए चुना. ये दो कम्पनियां हैं-

  • बैंगलोर स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड और
  • हैदराबाद स्थित इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन ऑफ़ इंडिया

बैंगलोर स्थित भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड भारत सरकार के अधीन काम करती है, और मुख्यतः भारतीय सशस्त्र बल के लिए इलेक्ट्रॉनिक सामग्रियां तैयार करती है. हैदराबाद स्थित ई.सी.आई.एल. भी भारत सरकार के अधीन है, और ‘डिपार्टमेंट ऑफ़ एटॉमिक एनर्जी’ के लिए काम करती है.

ईवीएम की डिजाईन और टेक्नोलॉजी (Electronic Voting Machine design and technology)

भारतीय ईवीएम, ‘टू पीस सिस्टम’ के अधीन काम करता है. इसका एक हिस्सा बैलेट यूनिट होता है, जिसमे पार्टियों और उम्मीदवारों के तहत कई बटन होते हैं, जो पांच मीटर लम्बी तार से इसकी दूसरी ईकाई इलेक्ट्रॉनिक बैलेट बॉक्स से जुडी होती है. वोटिंग बूथ में निर्वाचन आयोग द्वारा भेजे गये प्रतिनिधि मौजूद होते हैं. वोट डालते समय वोटर को बैलेट पेपर की जगह ईवीएम की बैलेट यूनिट में विभिन्न पार्टियों के चुनाव चिन्ह के सामने दिए गये नीले रंग के बटन को दबा कर वोट देना होता है. इस मशीन में प्रयोग होने वाला कंट्रोलर की प्रोग्रामिंग इतनी ज़बरदस्त होती है कि, एक बार ईवीएम बन जाने के बाद कोई उस प्रोग्राम को बदल नहीं सकता है. इसमें सिलीका का प्रयोग होता है.

इस मशीन में इस्तेमाल होने वाली बैटरी छः वाल्ट की एल्कलाइन बैटरी होती है. ईवीएम की ये डिजाईन देश की किसी भी जगह आसानी से इस्तेमाल होती है. ईवीएम में बैटरी इस्तेमाल होने की वजह से ये देश के उन जगहों के चुनावों में भी इसका इस्तेमाल होता है, जहाँ आज भी बिजली नहीं पहुँच पायी है. इस मशीन को इस तरह बनाया गया है कि, वोट देने वाले को किसी तरह के करंट के झटके का डर नहीं होता. एक बार किसी उमीदवार को वोट दे देने के बाद मशीन तुरंत लॉक हो जाती है, ताकि एक ही बटन को लगातार दो- तीन बार दबा कर एक ही उमीदवार को एक आदमी द्वारा वोट न दिया जा सके. इस तरह ईवीएम चुनाव में “एक आदमी एक वोट” के नियम को बनाए रखता है, और चुनाव में भ्रष्टाचार कम करता है. इसमें अधिकतम चौसंठ उम्मीदवारों के लिए वोटिंग कराई जा सकती है, उससे अधिक उमीदवार होने पर बैलेट बॉक्स का इस्तेमाल होता है.

ईवीएम का पहली बार प्रयोग (Electronic Voting Machine used for first time)

साल 1989 – 90 के बीच अस्तित्व में आने वाले ईवीएम का प्रयोग पहली बार सन 1998 में तीन राज्यों के उपचुनाव में 16 विधान सभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए किया गया. इनमे मध्यप्रदेश राज्य की छः सीटें, राजस्थान की पांच सीटें और दिल्ली की छः सीटें सम्मिलित थीं.

ईवीएम के प्रयोग के फायदे (Electronic Voting Machine benefits)

लोकतंत्र को मजबूत करने में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग का बहुत बड़ा योगदान है. इसके इस्तेमाल के कुछ फ़ायदे इस प्रकार हैं-

1. 1989-90 में जब ईवीएम मशीन खरीदे गए थे तब एक मशीन की लागत 5,500 रूपए थी जो वर्तमान समय के लगभग 41,000  रूपए या 610 अमेरिकी डॉलर के समकक्ष थी| उस समय यह लागत बहुत अधिक थी लेकिन ऐसी उम्मीद थी कि भविष्य में इस निवेश के माध्यम से मतपत्र की छपाई, उसके परिवहन और भंडारण तथा इनकी गिनती के लिए कर्मचारियों को दिए जाने वाले पारिश्रमिक के रूप में खर्च होने वाले लाखों रूपए की बचत की जा सकती है|
2. एक अनुमान के मुताबिक ईवीएम मशीन के प्रयोग के कारण भारत में एक राष्ट्रीय चुनाव में लगभग 10,000 टन मतपत्र बचाया जाता है|
3. ईवीएम मशीनों को मतपेटियों की तुलना में आसानी से एक जगह से दूसरे जगह ले जाया जाता है, क्योंकि यह हल्का और पोर्टेबल होता है।
4. ईवीएम मशीनों के द्वारा मतगणना तेजी से होती है।
5. आपको जानकर आश्चर्य होगा कि निरक्षर लोगों को भी मतपत्र प्रणाली की तुलना में ईवीएम मशीन के द्वारा मतदान करने में आसानी होती है।
6. ईवीएम मशीनों के द्वारा चूंकि एक ही बार मत डाला जा सकता है अतः फर्जी मतदान में बहुत कमी दर्ज की गई है।
7. मतदान होने के बाद ईवीएम मशीन की मेमोरी में स्वतः ही परिणाम स्टोर हो जाते हैं।
8. ईवीएम का “नियंत्रण इकाई” मतदान के परिणाम को दस साल से भी अधिक समय तक अपनी मेमोरी में सुरक्षित रख सकता है।
9. ईवीएम मशीन में केवल मतदान और मतगणना के समय में मशीनों को सक्रिय करने के लिए केवल बैटरी की आवश्यकता होती है और जैसे ही मतदान खत्म हो जाता है तो बैटरी को बंद कर दिया जाता है।
10. एक भारतीय ईवीएम को लगभग 15 साल तक उपयोग में लाया जा सकता है।

ईवीएम इस्तेमाल करने का तरीक़ा (How to use Electronic Voting Machine)

एक बार किसी आदमी द्वारा ईवीएम में वोट डाल दिए जाने पर कंट्रोल यूनिट का पुल्लिंग ऑफिसर इन- चार्ज मशीन मे दिया गया ‘क्लोज’ का बटन दबा देता है. इसके बाद ईवीएम कोई वोट नहीं ग्रहण करता. पोल बंद हो जाने पर बैलटिंग यूनिट कण्ट्रोल यूनिट से डिसकनेक्ट हो जाता है. वोट सिर्फ और सिर्फ बैलेट यूनिट में ही रिकॉर्ड हो सकता है. पोलिंग ख़त्म होने के बाद प्रिसाईडिंग ऑफिसर प्रत्येक पोलिंग एजेंट्स को कुल रिकॉर्ड हुए वोटों का एक ब्यौरा देते हैं. वोट गणना के समय में गिने जा रहे वोटों को इस ब्योरे से मिलाया जाता है, और इसमें यदि कोई विसंगति दिखती है, तो काउंटिंग एजेंट्स उसका ख़ुलासा करता है. मत गणना के समय मशीन में दिए गये ‘रिजल्ट बटन’ दबाकर तात्कालिक रिजल्ट्स की घोषणा होती है. कोई धोखे से रिजल्ट बटन पूरी गणना के पहले ही न दबा दे इससे बचने के लिए दो रास्ते हैं. पहला ये कि पोलिंग बूथ में वोटिंग ख़त्म हो जाने के बाद जब तक पोलिंग ऑफिसर –इनचार्ज क्लोज का बटन नहीं दबा देता है, तब तक रिजल्ट का बटन नही दबाया जा सकता. ये बटन छुपा हुआ एक पूरी तरह से सील रहता है. ये सिर्फ तब ही खोला जाता है, जब मशीन मत गणना केंद्र में होती है.

ईवीएम की होने वाली परेशानी (Electronic Voting Machine disadvantages)

इस के प्रयोग में एक बड़ी दिक्क़त ये है कि एक उमीदवार ये जान सकता है कि कितने लोगों ने उसे अपना वोट दिया है. इस वजह से जीतने वाला उमीदवार अपने क्षेत्र के उन लोगों के साथ पक्ष पात कर सकता है, जिन लोगों ने उन्हें वोट नहीं दिया. भारत के निर्वाचन आयोग ने ईवीएम के उत्पादक कंपनियों को इसमें एक ‘टोटलाइज़र’ लगाने की बात कही है, जिससे सिर्फ पूर्ण रिजल्ट का पता लगे न कि किसी उमीदवार के व्यक्तिगत रिजल्ट का. इसका निर्माण इस तरह से किये गया है, कि वोटिंग के समय सिर्फ और सिर्फ एक ही आदमी वोटिंग मशीन के पास रहता है.

ईवीएम की सुरक्षा के मसले (Electronic Voting Machine security issues)

भारतीय इवीएम के लिए होने वाले एक अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में ये पता लगा कि भारतीय चुनाव में इस्तेमाल होने वाले ईवीएम को जनता दल के अध्यक्ष और भारत सरकार में भूत पूर्व क़ानून मंत्री सुभ्रमंयम स्वामी की अध्यक्षता में रखा गया है. इससे हुआ ये कि भारत का निर्वाचन आयोग ईवीएम के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को ठीक से नहीं निभा पा रहा था, और इस सिस्टम में पारदर्शिता की कमी आ रही थी. अप्रैल 2010 में हरी प्रसाद के नेतृत्व में एक स्वाधीन जांच आयोग, जिसमे रोप गोंग्ग्रिजिप और जे. अलेक्स हलदेर्मन भी थे. एक रिपोर्ट तैयार किया गया. इस वीडियो में असली ईवीएम पर शोधकर्ताओं द्वारा दो तकनीकी हमले दिखाए गये.

इन धमकियों और ऐसी घटनाओं से पार पाने के लिए शोधकर्ताओं ने वोटिंग सिस्टम को और भी अधिक पारदर्शी बनाने की कोशिश की. इसके लिए उन लोगों ने पेपर बैलेट, काउंट ऑप्टिकल स्कैन और वोटर वेरीफाईड पेपर ऑडिट ट्रेल का सुझाव दिया. भारतीय निर्वाचन आयोग ने कहा कि ईवीआईएम में ऐसी चीज़ों को करने के लिए सबसे पहले तो ऐसी हरक़त करने के किसी आदमी को ईवीएम को खोलना होगा, साथ ही इसके लिए बहुत ऊंची तकनीकी बुद्धि का इस्तेमाल करना होगा. ईवीएम को बहुत ही कड़ी से कड़ी निगरानी में रखा जाता है, और किसी को उसे हाथ लगाने की इजाज़त नहीं होती. साथ ही एक चुनाव के परिणाम में फेर बदल करने के लिए अधिक से अधिक मशीनों की आवश्यकता होगी. 25 जुलाई 2011 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक पिटीशन के तहत निर्वाचन आयोग को ईवीएम को और बेहतर बना कर तीन महीने के अन्दर रिपोर्ट पेश करने को कहा. पिटीशन देने वाले राजेंद्र सत्यनारायण गिल्डा का ये कहना था कि निर्वाचन आयोग ईवीएम के पारंपरिक प्रस्तुतिकरण के साथ ही चुनाव करवा रही है. इनके अनुसार ईवीएम में एक ऐसी सुविधा होनी चाहिए कि वोटर ने जिस पार्टी को वोट दिया है, उस पार्टी के चुनाव चिन्ह के साथ एक पुर्जा ईवीएम से निकले, ताकि इसकी पुष्टि हो सके कि वोट वोटर द्वारा समर्थित उम्मीदवार को ही गया है.

मतदाता – सत्यापन कागज लेखा परीक्षा परिक्षण (Voter Verified Paper Audit Trail)

अक्टूबर 2008 में निर्वाचन आयोग ने आईआईटी मुंबई के पूर्व निर्देशक पी वी इन्दिरसन की अध्यक्षता में ईवीएम में VVPAT व्यवस्था लाने के लिए एक तकनीकी टीम का गठन किया. कमेटी को ये काम सौंपा गया कि कमीटी ईवीएम में ऐसी व्यवस्था लाये, जिसके ज़रिये वोट करने वाले नागरिक को वोट करने के बाद एक काग़ज़ का परचा मिले, जिसमे उसके द्वारा निर्वाचित उमीदवार का चुनाव चिन्ह मौजूद हो. कमेटी ने जल्द ही इस काम को अंजाम दिया.

21 जून 2011 को निर्वाचन आयोग ने कमेटी द्वरा सुझाये गये VVPAT व्यवस्था को स्वीकार किया, और 26 जुलाई 2011 में इस व्यवस्था के तहत जम्मू कश्मीर के लद्दाख, केरला के थिरुवानान्थापुरम, मेघालय के चेरापूंजी, पूर्वी दिल्ली और राजस्थान के जैसलमेर में इस सिस्टम के द्वारा चुनाव करवाया गया.

जल्द ही दिल्ली उच्च न्यायालय से ये परिणाम आया कि ईवीएम “टेम्पर – प्रूफ” नहीं है. भारत निर्वाचन आयोग ने 19 जनवरी 2012 को इलेक्ट्रॉनिक कारपोरेशन और भारत इलेक्ट्रॉनिक लिमिटेड को ये आदेश दिए, कि नए ईवीएम में काग़ज़ी पुर्जे प्रिंट होने की सुविधा होनी ज़रूरी है. जब कोई वोटर अपने उम्मीदवार को वोट देता है तो उस पुर्जे में उमीदवार का नाम बैलेट मशीन में दिया गया सीरियल नंबर और उमीदवार का चुनाव चिन्ह उस पुर्जे में छपा होना चाहिए. VVPAT व्यवस्था 543 में से आठ सीटों पर प्रारंभिक प्रोजेक्ट के तौर पर इस्तेमाल करके देखा गया. इनमे लखनऊ, गांधीनगर, साउथ बंगलोर, सेंट्रल चेन्नई, जादवपुर, पटना साहिब और मिजोरम सीटें थीं.

ईवीएम की विशेषताएँ

  • यह छेड़छाड़ मुक्त तथा संचालन में सरल है
  • नियंत्रण इकाई के कामों को नियंत्रित करने वाले प्रोग्राम "एक बार प्रोग्राम बनाने योग्य आधार पर"माइक्रोचिप में नष्ट कर दिया जाता है। नष्ट होने के बाद इसे पढ़ा नहीं जा सकता, इसकी कॉपी नहीं हो सकती या कोई बदलाव नहीं हो सकता।
  • ईवीएम मशीनें अवैध मतों की संभावना कम करती हैं, गणना प्रक्रिया तेज बनाती हैं तथा मुद्रण लागत घटाती हैं।
  • ईवीएम मशीन का इस्तेमाल बिना बिजली के भी किया जा सकता है क्योंकि मशीन बैट्री से चलती है।
  • यदि उम्मीदवारों की संख्या 64 से अधिक नहीं होती तो ईवीएम के इस्तेमाल से चुनाव कराये जा सकते हैं।
  • एक ईवीएम मशीन अधिकतम 3840 वोट दर्ज कर सकती है।

ईवीएम अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1 : इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन क्या है? इसकी कार्यप्रणाली मतदान करने की पारम्परिक प्रणाली से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर : इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पांच-मीटर केबल द्वारा जुड़ी दो यूनिटों-एक कंट्रोल यूनिट एवं एक बैलेटिंग यूनिट-से बनी होती है। कंट्रोल यूनिट पीठासीन अधिकारी या मतदान अधिकारी के पास होती है तथा बैलेटिंग यूनिट वोटिंग कम्पार्टमेंट के अंदर रखी होती है। बैलेट पेपर जारी करने के बजाए, कंट्रोल यूनिट का प्रभारी मतदान अधिकारी बैलेट बटन को दबाएगा। यह मतदाता को बैलेटिंग यूनिट पर अपनी पसंद के अभ्यर्थी एवं प्रतीक के सामने नीले बटन को दबाकर अपना मत डालने के लिए सक्षम बनाएगा।

प्रश्न 2 : निर्वाचनों में ईवीएम का पहली बार चलन कब शुरू किया गया?

उत्तर : वर्ष 1989-90 में विनिर्मित इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का प्रयोगात्मक आधार पर पहली बार नवम्बर, 1998 में आयोजित 16 विधान सभाओं के साधारण निर्वाचनों में इस्तेमाल किया गया। इन 16 विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों में से मध्य प्रदेश में 5, राजस्थान में 5, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली में 6 विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्र थे।

प्रश्न 3 : उन क्षेत्रों में जहां बिजली नहीं है, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों का किस प्रकार इस्तेमाल किया जा सकता है?

उत्तर : ईवीएम भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, बेंगलूर एवं इलेक्ट्रॉनिक कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया लिमिटेड; हैदराबाद द्वारा विनिर्मित 6 वोल्ट की एल्कलाइन साधारण बैटरी पर चलती है। अत:, ईवीएम का ऐसे क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सकता है जहां पर बिजली कनेक्शन नहीं हैं।

प्रश्न 4 : अधिकतम कितने मतों को ईवीएम में डाला जा सकता है?

उत्तर : ईवीएम में अधिकतम 3840 मत दर्ज किए जा सकते हैं। जैसाकि सामान्यब तौर पर होता है, एक मतदान केन्द्र में निर्वाचकों की कुल संख्याह 15,00 से अधिक नहीं होगी फिर भी, ईवीएम की क्षमता पर्याप्त् से अधिक है।

प्रश्न 5 : अधिकतम कितने अभ्यैर्थियों के लिए इलेक्ट्रॉ निक वोटिंग मशीनें काम कर सकती हैं?

उत्तर : ईवीएम अधिकतम 64 अभ्य‍र्थियों के लिए काम कर सकती है। एक बैलेटिंग यूनिट में 16 अभ्यमर्थियों के लिए प्रावधान है। यदि अभ्यर्थियों की कुल संख्याे 16 से अधिक हो जाती है तो पहली बैलेटिंग यूनिट के साथ-साथ एक दूसरी बैलटिंग यूनिट जोड़ी जा सकती है। इसी प्रकार, यदि अभ्येर्थियों की कुल संख्या 32 से अधिक हो तो एक तीसरी बैलेटिंग यूनिट जोड़ी जा सकती है और यदि अभ्यथर्थियों की कुल संख्या 48 से अधिक हो तो एक चौथी यूनिट अधिकतम 64 अभ्ययर्थियों के लिए काम करने हेतु जोड़ी जा सकती है।

प्रश्न 6 : यदि किसी निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यतर्थियों की संख्या् 64 से अधिक हो जाए तो क्यां होगा?

उत्तर : यदि किसी निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचन लड़ने वाले अभ्यर्थियों की संख्या 64 से अधिक हो जाए तो ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में ईवीएम का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। ऐसे निर्वाचन क्षेत्र में मत पेटी एवं मत पत्र के माध्येम से किए जाने वाले मतदान की पारम्पररिक प्रणाली को अपनाना पड़ेगा।

प्रश्न 7 : यदि किसी खास मतदान केन्द्र में ईवीएम खराब हो जाए तो क्या होगा?

उत्तर : एक अधिकारी को मतदान के दिन लगभग 10 मतदान केन्द्रोंु को कवर करने के लिए ड्यूटी पर लगाया जाता है। वे अपने पास अतिरिक्त ईवीएम रखे रहेंगे और खराब ईवीएम को नई ईवीएम से बदला जा सकता है। ईवीएम के खराब होने के चरण तक दर्ज मत कंट्रोल यूनिट की मेमोरी में सुरक्षित रहेंगे और ईवीएम के खराब होने के बाद से मतदान प्रक्रिया जारी रखना पर्याप्ते होगा। प्रारम्भी से, मतदान शुरू करना आवश्यरक नहीं है।

प्रश्न 8 : ईवीएम को किसने बनाया है?

उत्तर :इलेक्ट्रॉ निक वोटिंग मशीनें ढेरों बैठकें करने, प्रोटोटाइपों की परीक्षण-जांच करने एवं व्याजपक फील्डह ट्रायलों के बाद दो लोक उपक्रमों अर्थात भारत इलेक्ट्रॉ निक्स लिमिटेड, बेंगलूर एवं इलेक्ट्रॉ निक कॉर्पोरेशन ऑफ इण्डिया, हैदराबाद के सहयोग से निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार एवं डिजाइन की गई है। अब, इलेक्ट्रॉ निक वोटिंग मशीनें उपर्युक्तच दो उपक्रमों द्वारा विनिर्मित की जाती हैं।

प्रश्न 9 : मशीन की लागत क्याव है? क्या‍ ईवीएम का प्रयोग करना अत्यीधिक खर्चीला नहीं है?

उत्तर : वर्ष 1989-90 में जब मशीनें खरीदी गई थीं उस समय प्रति ईवीएम (एक कंट्रोल यूनिट, एक बैलेटिंग यूनिट एवं एक बैटरी) की लागत 5500/- थी। यद्यपि, प्रारंभिक निवेश किंचित अधिक है, लाखों मत पत्रों के मुद्रण, उनके परिवहन, भंडारण आदि, और मतगणना स्टाकफ एवं उन्हें् भुगतान किए जाने वाले पारिश्रमिक में काफी कमी हो जाने की दृष्टि से हुई बचत के द्वारा अपेक्षा से कहीं अधिक निष्प्र भावी हो जाता है।

प्रश्न 10 : हमारे देश की जनसंख्याा के एक काफी बड़े हिस्सेग के निरक्षर होने के परिणामस्व रूप क्या् इससे निरक्षर मतदाताओं के लिए समस्यान नहीं उत्पेन्न होगी?

उत्तर : दरअसल, ईवीएम के द्वारा मतदान किया जाना पारम्पसरिक प्रणाली की तुलना में कहीं अधिक सरल है जिसमें एक व्यक्ति को अपनी-अपनी पसंद के अभ्यपर्थी के प्रतीक पर या उसके समीप मतदान का निशान लगाना पड़ता है, पहले उसे उर्ध्वादधर रूप में और फिर क्षैतिज रूप में मोड़ना पड़ता है और उसके बाद उसे मत पेटी में डालना पड़ता है। ईवीएम में, मतदाता को केवल अपनी पसंद के अभ्यकर्थी एवं प्रतीक के सामने नीला बटल दबाना होता है और मत दर्ज हो जाता है। ग्रामीण एवं निरक्षर लोगों को अपना मत दर्ज करने में कोई कठिनाई नहीं होती है और उन्होंने तो बल्कि ईवीएम के उपयोग का स्वा गत किया है।

भारत द्वारा नेपाल, भूटान, नामीबिया, फिजी और केन्या जैसे देशों ने ईवीएम मशीन का निर्यात किया गया है। नामीबिया द्वारा 2014 में संपन्न राष्ट्रपति चुनावों के लिए भारत में निर्मित 1700 “नियंत्रण इकाई” और 3500 “मतदान इकाई” का आयात किया गया था। इसके अलावा कई अन्य एशियाई और अफ्रीकी देश भारतीय  ईवीएम मशीनों की खरीद में रूचि दिखा रहे हैं।

Jai Hind!

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