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बच्चों को बढ़ावा, उत्साह और सकारात्मक करने के तरीके | Positive, motivate and appreciate your child


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सभी पैरेंट्स चाहते हैं कि लोग उनके बच्चे के व्यवहार से प्रभावित हों, उनकी प्रशंसा करें, आपके बच्चों को आपसे बेहतर कोई नहीं सिखा सकता, इसलिए यह पैरेंट्स की ज़िम्मेदारी है कि वे बच्चों को ये बातें सिखाएं.. …

बच्चों को बढ़ावा देने के तरीके, बच्चों को सिखाएं शिष्टाचार | Appreciate your child with positive moivational comment

आज आपने भी देखा होगा की हर कोई इंटरनेट की दुनिया में अपने कदम बढ़ा रहा है . इंटरनेट सारी दुनिया को सँजोकर रख देता है . कठिन से कठिन कार्य भी सरलता पूरक कम समय में किये जा रहे है.हम मानते है की इंटरनेट ने जहां एक ओर हमारे जीवन को आसान बनाया है, वहीं इससे बढ़ते अपराधों ने लोगों को काफी नुकशान भी पहुंचाया है।

आजकल माता-पिता के सामने सबसे बढ़ी समस्या यह है कि अपने बच्चों की परवरिश कैसे करे उनको किसी अच्छे कम के लिए बढ़ावा या प्रोतसाहित कैसे करें। जहाँ एक ओर अपनी व्यस्त दिनचर्या है, तो दूसरी ओर अपने बच्चों के भविष्य की चिंता। अगर हम पहले की बात करे, तो उस समय घर की जिम्मेदारियाँ बटी हुई थी. जहाँ पिता बच्चों की सुविधा के लिये धन अर्जित करने के लिये काम करते थे, तो वही माता घर पर रहकर अपने बच्चों का ध्यान रखती थी। परंतु आज समय समय बदल चुका है। आज के समय में जहाँ साधन बड़े है, तो उनपर होने वाला खर्च भी बढ़ा है। आज पिता के साथ-साथ माता को भी बाहर की इस भाग दौड़ में उतरना पढ़ा है। इसका सबसे गहरा असर घर के बच्चों पर पढ़ा है। घर में बच्चों को माता पिता की एक झलक के लिये सुबह से शाम तक का इंतजार करना होता है. जब वे स्कूल से घर लौटते है, तो उन्हे अपनी बातों को बताने के लिये भी धैर्य रखना पढ़ता है। यह सब बाते आपके समक्ष रखने का एक मात्र कारण ये है कि आज के समय में बच्चों के साथ होने वाली कठिनाइयों को आपके सामने लाया जाये। ताकि आप उनपर विचार कर सकें और अपने बच्चे का बेहतर भविष्य तराश सके।

आज के समय में हर माता-पिता की एक या दो संतान होती है। माता-पिता का कर्तव्य होता है कि उन्हे सही दिशा प्रदान करे ताकि वे अपने भविष्य का बेहतर निर्माण कर पाये। अब बात उठती है बेहतर भविष्य की तो उसके लिये आवश्यक होगा कि आप बच्चों को बाल्यकाल से ही अच्छे संस्कार दें, क्यूकी “एक मज़बूत निव पर ही सुदृढ़ भवन खड़ा किया जा सकता है”।

अगर हम बच्चों की बात करे, तो हर संतान, हर उम्र में अपने माता पिता के लिये नासमझ ही होती है। और ये सही भी है ,उम्र के एक पढ़ाव तक हर संतान को अपने माता-पिता की समझाइश और उनके अनुभव की आवश्यकता पढ़ती है। इसका सबसे अच्छा उदाहरण है, एक शिशु को जन्म देंने वाली माँ से ले सकते है। एक माँ जिसने अभी-अभी एक शिशु को जन्म दिया है, परंतु उसे फिर भी इस समय अपनी माँ या अपनी माँ रुपी सास के सहयोग और परामर्श की सबसे अधिक जरूरत पढ़ती है, ताकि वह अपने शिशु को संभाल पाये।

उम्र के हर पढ़ाव पर हर बच्चे को अलग तरह के प्रोत्साहन की जरूरत होती है। माता-पिता को चाहिए कि वो अपने बच्चे की जरूरत और मानसिक स्तिथि को समझ कर उसका सही तरीके से सहयोग करे। ताकि आगे चलकर बच्चा एक सफल, सुद्रढ़ और आकर्षक व्यक्तित्व का इंसान बन पाये।

बच्चों को बढ़ावा देने के उपाय

जैसा कि मैंने पहले भी कहाँ है कि हर उम्र में बच्चे को एक अलग प्रोत्साहन की जरूरत होती है। तो यहाँ बच्चों को उम्र के हिसाब से कुछ भागों में बाँटकर उनके प्रोत्साहन की जरूरत को मै आपसे यहाँ सांझा कर रही हूँ, शायद इसे पढ़कर आप बच्चों को सँभालने का बेहतर तरीका समझ सकें।

0 से 5 साल तक के बच्चे : यह बच्चे की उम्र का प्रथम पढ़ाव है। जहाँ वह बोलना सीखता है, अपनों की पहचान करता है, जहाँ वह खाना सीखता है। आपको जरूरत है कि इसी अवस्था से अपने बच्चों का ध्यान दें, ताकि आगे चलकर ये उनकी आदत का हिस्सा बने।

इस उम्र में ध्यान रखने योग्य बातें :

बच्चों की खाने-पीने की आदतों पर ध्यान दें -: यही वह उम्र है, जब बच्चा खाना सीखता है, आजकल देंखा गया है कि बच्चों के खाने पीने के नखरे के चलते माता उन्हे बिना मिर्च का खाना या खाने को मिक्सर में पिसकर खिलाती है और यह धीरे धीरे बच्चे की आदत में आ जाता है और वह अन्य तरह का खाना नही स्वीकार करता। इसका सबसे बढ़ा नुकसान तब देंखने मिलता है जब बच्चे के बढ़े होने पर आप उसे लेकर 2-3 दिन के लिये कही बाहर जाते है और वह कुछ खा नहीं पाता।

बच्चों में अच्छा और मीठा बोलने की आदत ड़ाले -: जब बच्चा बोलना सिखता है, तो उसे शुरवात से ही अच्छे शब्दो का इस्तेमाल करना सिखायें ताकि वह उसकी आदत बन जाए। कई बार देंखा गया है कि बच्चों की तुतलाती भाषा सुनने में अच्छी लगने के कारण हम उसे कुछ गलत शब्द सीखा देंते है और उसका हसकर आनंद लेते है। बच्चों को यह चीज सही लगने लगती है और यह उसकी आदत में शामिल हो जाता है, जो कई बार हमें दूसरों के सामने शर्म का पात्र बनाता है।

बच्चे के मानसिक और बौध्दिक विकास पर ध्यान दें -: आजकल तीन साल की उम्र से बच्चा स्कूल जाने लगता है, यही वह वक़्त है जब वह दूसरों के सामने कुछ बोलने में शर्म महसूस नहीं करता। तो इस समय आप मोबाइल विडिओ या अन्य माध्यम से बच्चों को नयी नयी पोयम और कहानिया सिखाये और उसे दूसरों के सामने सुनाने को कहे। ताकि बच्चा शुरवात से ही अपनी बात सबके सामने कहने की हिम्मत जूटा सके और स्कूल जाते समय उसे नए माहोल में कोई दिक्कत ना हो।

6 से 16 साल की उम्र : यह वह समय है, जब बच्चों को अपने माता पिता के सहयोग की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। चाहे वह स्कूल का एक्जाम हो या वार्षिक उत्सव या कोई अन्य एक्टिविटी बच्चे बिना माता-पिता के सहयोग के नहीं कर पाते। और इस समय माता-पिता का सहयोग उन्हे एक अलग ही प्रोत्साहन देंता है।

इस उम्र में आपको क्या बातें ध्यान रखनी चाहिए :

बच्चे की हर एक्टिविटी पर नजर रखे -: माता-पिता ही वह पहले इंसान है, जो अपने बच्चों के बारे में सबकुछ जानते है। उन्हे सभी बातों जैसे आपके बच्चे के स्कूल में क्या चल रहा है, उनकी पैरेंट्स मीटिंग कब है, आपके बच्चों को कौनसा सब्जेक्ट कठिन लगता है आदि बातों का ध्यान रखना चाहिए।

बच्चों की बातों को कुशलता से सुने और उन्हे परखे -: अगर आपका बच्चा आपकों स्कूल से लौटने के बाद अपनी दिनचर्या बताता है, तो उसे ध्यान से सुने और उसे समझने का प्रयास करे कि उसने दिनभर क्या किया। उसका आकर्षण किस ओर है और उसे क्या करना अच्छा लगता है।

बच्चों पर अपनी इच्छाओं का दबाव न ड़ाले -: अन्य बच्चों के मार्क्स देंखकर अपने बच्चों पर दबाव ना बनाये, हो सकता है आपके बच्चे की क्षमता अलग हो और वह आपकी इच्छाओ की पूर्ति करने में समर्थ ना हो।

बच्चों की तुलना अन्य बच्चों से न करे -: हमेंशा किसी अन्य बच्चे की तुलना अपने बच्चे से ना करे, इससे उसके मन में ईष्या जन्म लेती है या हो सकता है उसका आत्मविश्वास कम होने लगे और वह अपने आप को अन्य बच्चों से कमजोर समझने लगे।

बच्चे को उचित प्रोत्साहन दें -: जब बच्चा किसी काम में सफल हो, तो उसका उचित प्रोत्साहन करें और जब वह असफल हो तब भी उसके साथ खड़े रहकर उसे मार्गदर्शन दें।

बच्चे का अच्छा सोशल नेटवर्क डेव्ल्प करने में मदद करे -: यही वह वक़्त है, जब बच्चे बाहर निकलते है, उनके दोस्त बनते है , तो अप्रत्यक्ष रूप से उनपर ध्यान दें .इस बात का ध्यान दें, कि कही वे किसी गलत आदत का शिकार तो नहीं हो रहे। और हा ध्यान रखिये यह ध्यान कही दखल अंदाजी ना बन जाए, ताकि बच्चे आपसे चिढ़ने लगे।

बच्चे की पढ़ाई और अन्य चीजों में दिलचस्पी ले -: इस समय बच्चों को पढ़ाई में भी माता-पिता के सहयोग की आवश्यकता होती है, तो इस बात का ध्यान रखे। उनके पढ़ने का टाइम टेबल बनाये, जब वह पढ़ रहे हो टीवी बंद रखे और उनके प्रोजेक्ट एक्टिविटी में उनका साथ दें। आवश्यकता हो तो जब वे पढ़ रहे हो तो उनके साथ बैठे।

बच्चे का उत्साह बढ़ाने के लिए नयी-नयी चीजें प्लान करे -: बच्चे की हर छोटी से छोटी उपलब्धि में उसका प्रोत्साहन करे, जैसे एक्जाम में अच्छे नंबर आने पर गिफ्ट दें या एक फ़ैमिली ट्रिप प्लान करे ताकि बच्चों का उत्साह बना रहे।

16 से 21 साल तक के बच्चे : कहाँ जाता है कि जब बच्चों के पैरो का नाप माता-पिता के बराबर हो जाये तो वह दोस्त बन जाते है। मतलब इस उम्र में माता पिता को अपने बच्चों से दोस्तो जैसा व्यवहार करना चाहिए। उनसे हर बात शेयर करे, इस उम्र में बच्चों को घर के मुख्य फ़ैसलों में शामिल करे, ताकि वे अपनी जिम्मेदारी भी भली भाँति समझ सके।

वैसे यही वह उम्र है, जब बच्चे अपनी मनमानी करना चाहते है, उन्हे लगता है वे बढ़े हो गए, अपने सारे फैसले खुद ले सकते है और उनके द्वारा लिया गया हर फैसला सही है। इस उम्र में ही बच्चे बाहर के लोगों को फॉलो करने लगते है, बाहरी आकर्षण उन्हे प्रभावित करने लगता है।

बच्चों की इस उम्र में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए :

बच्चों पर भविष्य को लेकर दबाव ना बनाये -: यही वह वक़्त है, जब बच्चे अपना स्कूल पूरा कर कॉलेज में आते है। यह समय कैरियर का टर्निंग पॉइंट होता है, जब बच्चा अपने लिये भविष्य की दिशा चुनता है। यहाँ माता पिता को ध्यान रखना चाहिये, कि बच्चा अपना भविष्य चुनने में स्वतंत्र हो उस पर किसी तरह का कोई दबाव नहीं हो।

बच्चों को बाहरी दुनियाँ से अवगत करायें और सही गलत का ज्ञान दें -: यही वह उम्र होती है, जब बच्चे के गलत दिशा में जाने की संभावना सबसे ज्यादा होती है, वह बाहर की दुनिया की चकाचौंद में मंत्रमुग्ध हो जाता है। और उसे ही फॉलो करना चाहता है। तब आपको जरूरत है कि आप उसके दोस्त की तरह रहे उसके साथ आउटिंग करे और जाने की आपके बच्चे के मन में क्या चल रहा है।

बच्चों से बात करने की आदत ड़ाले -: इस समय बच्चे से अपने अनुभव सांझा करे, ताकि वह उनसे कुछ सीख पाये। और अपनी बाते भी आपकों खुलकर बता पाये।

21 साल से बढ़ी उम्र में : पहले के समय में इस उम्र में शादी हो जाया करती थी, परंतु अब समय बदल चुका है और बच्चे कैरियर पर फोकस करना चाहते है। आज चाहे वह लड़की हो या लड़का वह पहले अपना भविष्य को रोशन करना चाहते है, तो माता-पिता को चाहिये कि उनकी बातों को समझे और उनका साथ दें।

बच्चों को प्रोत्साहित करने के कुछ तरीके :

  • बच्चों में अच्छे काम के लिए रिवार्ड और बुरे काम के लिए सजा का डर बनाये : हर अच्छे काम के लिये अपने बच्चे को रिवार्ड दें और हर बुरे काम पर उसे छोटी सी चीज पर सजा जरूर दें। रिवार्ड से मतलब यह बिलकुल नहीं है, किआप उसे कुछ बढ़ा सा तोहफा दें, आप चाहे तो अपनी बातों से उसे प्रोत्साहित करके भी उसे रिवार्ड दे सकते है। और सजा से भी हमारा मतलब यह बिलकुल नहीं है, कि आप बच्चे को बुरी तरह मारे, बल्कि मेंरा मानना तो यह है कि ज़्यादा मारने से भी कुछ समय पश्चात बच्चे पर उसका असर खतम होने लगता है। आपकी कुछ समय की चुप्पी भी आपके बच्चों के लिये सजा से कम नहीं होती, तो यह भी सजा के रूप में काफी है।
  • बच्चों के लिए अपनी भावनाओ को जाहीर करे : अपने बच्चे को रोजाना यह जाहीर करे की आप उससे बहुत प्यार करते है, और उसकी हर बात का आपके जीवन पर प्रभाव पढ़ता है।
  • बच्चों के लिए समय निकालें : अपने बच्चों के लिये समय निकालें यद्यपि आज कल की भाग दौड़ भरी लाइफ में यह करना थोड़ा मुश्किल है, परंतु यह आपके बच्चे के लिये एक एनर्जि बूस्टर साबित होगा। कुछ समय अपने बच्चों के साथ व्यतित करने और उनसे बाते शेयर करने से आप उनकी लाइफ में क्या चल रहा है यह भी जान पाएंगे और जरूरत पढ़ने पर उन्हे सही सलाह और मदद भी दे पाएंगे।
  • बच्चों के जीवन में अनुशासन (डिसिप्लिन) लाने की कोशिश करें : यक़ीन मानिए अपने बच्चों की लाइफ में थोड सा अनुशासन बहुत जरूरी है. इसकी जरूरत वे अभी भले ही ना समझे परंतु कुछ समय पश्चात वे इसे जरूर समझेंगे और आपका शुक्रिया अदा करेंगे।
  • बच्चों की खुशी में अपनी खुशी जाहीर करे : जब आप अपने बच्चों पर गर्व महसूस करे, तो यह उनके सामने जाहीर अवश्य करे ताकि उन्हे प्रोत्साहन मिल पाये। आपकों उनकी बातें क्यू अच्छी लगी उन्हे बताए और वे इसमें और क्या बेहतर कर सकते है यह भी उन्हे बताए। अपने बच्चों को उनकी खूबियों से अवगत करायें और उसे निखारने में उनका साथ देंवे।
  • बच्चों की गलती पर सही मार्गदर्शन करें : जब आपके बच्चे से कोई गलती हो जाये, तो उसकी स्थति को समझते हुये उसके साथ व्यवहार करे. हो सकता है कि उस समय उसे आपकी ड़ाट फटकार से ज़्यादा आपके साथ की जरूरत हो।

ये सभी बाते आपकों आपके बच्चे के विकास में सहायक होगी और आपकों इन बातों का ध्यान रखना ही चाहिये, ताकि आपके बच्चे का उचित विकास हो पाये और वह एक बेहतर इंसान बन पाये।

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